बिसात


शतरंज के कुछ मोहरे दांव पर लगे हैं,
जिन्हें तुम अपनी भाषा में;
हाशिये पर के लोग कहते हो
एक वज़ीर है जो दे रहा है निर्देश उनको
उसके इशारे से सब रसूखदारों ने
अपनी चाल संयमित
औ' निर्धारित कर ली है
यही होता है दिलों में, रिश्तों में,
समाज में, मुल्क में
और विश्वस्तर पर भी

आज राजा की जरुरत नहीं है
औ' वजीर खुद को चे़क-मेट नहीं करेगा
तो जो प्यादे नपने को बिठाये गए हैं
उनकी फिक्र कौन करेगा ?

1 टिप्पणियाँ:

pukhraaj said...

एक राजनीति दिलों में चल रही है
एक सियासत रिश्तों में पल रही है
समाज मुल्क का क्या कहना
घरों में यही आग जल रही है