मिज़ाजी-ज़ायका


अपनी जिंदगी से वो नाखुश रहता है...

उसे देर तक याद नहीं आता
पिछली बार खुल कर कब हँसा था
मुझसे शिकायत करता है
रोज़ सुबह मिजाज़ का जायका ख़राब रहता है

हादसों को सर पर लिए घूमता है
कहता है -
हलचल दिखती नहीं
उससे बदलाव होते नहीं
उठा-पटक को दबा दिया जाता है

मनुष्य शायद ...
गतिविधियों पर नियंत्रण रखना सीख गया है
सीमित हो गया है उसका दायरा

फिर अपनी कमजोरी बताने लगता है
वो खुद भी कहाँ फ़लक का मालिक रहा
एक निर्बाध दुनिया थी...
फिर, डरकर सिमटने लगता है...

1 टिप्पणियाँ:

केतन कनौजिया 'शाइर' said...

bahut badiya sagar sahab...