Tuesday, February 21, 2012

फाल्गुन 2, शक संवत 1933। कृष्ण अमावस्या, विक्रम 2068। सौर फाल्गुन मास की 9 प्रविष्टे। उत्तरायण। बसंत ऋतु

भोर का गीला बादल जैसे गीली मिटटी पर पर खड़ा गाँव का घर
वो कहीं फैला हल्का पारदर्शी गुलाबी टुकड़ा जैसे कड़क कर रस्सी से गिर परा कोई गुलाबी दुपट्टा
कहीं एक थक्का रूई रखा हुआ जैसे रात के आँगन में चौकड़ी भरते एक पंख छूटा हंस का
दो तिहाई स्लेटी आकाश
एक तिहाई गदलाया आसमान जैसे बरसाती गंगा

सतह से ऊपर रखा कोई अदृश्य हीरा
अब प्रकाश छान रहा है, छू रही हैं अदृश्य किरणें अब सबकी मुंडेर को
बिना पलस्तर दीवार रात भर ऊँघता, गुटर गूं करता
अपनी बुजुर्गियत झाड़ता, गला साफ़ करता बूढा कबूतर

दो रंग घुलेंगे आपस में अभी तो
कोलर चढ़ा कर एक बच्चा लाल गेंद लिए निकलेगा
प्रेशर कूकर के रबड़ जितनी परिधि में दिन भर आइना चमकाता फिरेगा

एक झुण्ड निकला है पश्चिम से अभी
इतने नन्हे कि जैसे किसी ने अभ्रक के बुरादे उडाये हों

मैं आसमान की नदी में एक बाल्टी डूबा कर
सबकी पत्तल में एक एक कलछुल गीला बादल परोसता हूँ.
किसी प्रवासी पंछी के सफ़ेद फ़र को थोडा सा रंगता हूँ.

एक आदमी का, आदमी के बिना किसी सुबह को देखना अच्छा है.

Wednesday, January 18, 2012

स्टोव


तीन टांगों पर खड़ा, अदना सा बेढब जिस्म वाला 
मेरे घर में विकलाग बैंक के क्लर्क जैसा लगता है 
जो अनुकम्पा की आधार पर नियुक्त हुआ है. 
स्टोव.

जिसके ऊपर की पीतल के रंग छड़ी टेढ़ी मेढ़ी थाली किसी बच्ची के फ्रोक जैसी लगती है 
नीचे कोई प्रसाद की छोटी सी प्लेट 
फिर आग का फुग्गा जलता है 
बीच के खम्बे भूख -पेट के घर की दीवारें
तली एक बुजुर्ग पेट लिए बैठा है 
स्टोव 

सर्दियों में,
जब हमारे अच्छे दिन होते 
(जिस महीने मैं टाई के लिए स्कूल में नहीं पिटता, शीशम पर मिट्टी नहीं  चढ़वानी होती, सायकिल के रिम, टायर और टियूब नहीं बदलवाने होते, बाज़ार में मजबूरी में बेसन खरीदते वक्त मेरी अनपढ़ माँ  की राजनीतिक चेतना नहीं जागती होती और वो नरसिंह राव सरकार को नहीं कोस रही होती)

हम किरोसिन भरवा कर रात भर स्टोव को घेरे रहते  
धीमी -धीमी आंच पर माँ -पापा से कहानियां सुनाते
स्टोव मंद -मंद मुसकाता रहता 
किस्सागोई की परम्परा दौड़ती रहती 
उसकी छातियाँ नुकीली रहती 
दरअसल,
साहित्य से जुड़ाव होना हमारा कोई पुश्तैनी शौक नहीं
अभाव से उपजा एक रोग है.

मैं तलाश रहा हूँ वो किताब जिसमें स्टोव का शब्दांकन ठीक मेरी यादों में बसा जैसा हो.
लेकिन ये अंतर स्क्रीन प्ले और उपन्यास जैसा ही रहा 
ये फर्क किसी चादर के इस्तेमाल के बाद उसपर कब्र बनाने सा रहा 
स्टोव हमारी याद में कुंडली मार कर बैठा है 
जैसे याद में कोई इनारे से झांकता अपना ही चेहरा 

हम मकान मालिक के यहाँ से निकाले जाते 
'किताब के अक्षर छोटे हैं इसलिए पानी आता है'
कि आड़ में  रोने की सहूलियत गढ़ते
अनपढ़ माँ स्टोव के ठीक वासर को खराब बता ज़ोर से आंच देती 
एक निम्न वर्गीय परिवार के औरत का विद्रोह 
अपने करम कूटने जैसा ठक- ठक बजता 
स्टोव बुक्का फाड़ कर धधकने लगता

हालांकि खाना जल्दी पकता 
फिर भी घर में झगडे होते
पिताजी इसी स्टोव (चूल्हे) के जलने का वास्ता देते 
ईश्वर के शुक्रिया अदा करने का पाठ पढ़ाते 

स्टोव प्रतीक बन गया था हमारे अस्तित्व का
जो कोयला फोड़े जाने तक ज़ारी रहा 
और 
मैंने पिस्तौल के दम पर एक गैस चूल्हा लाने की सोची 

माँ के हाथ से गोल हो सिंकती है रोटी 
स्टोव बस उसे पकाता है.
तीन टांगों पर खड़ा अदना सा विकलागं ये क्लर्क   
फिर भी, हमारे घर का पांचवां सदस्य है.

Thursday, November 17, 2011

नज़मा आत्मविरोध में विज्ञापन करती है



बिल्डिंगों के जंगल हैं
रस्सियों पर लटककर चमकीले शीशों की सफाई चलती रहती है
कारोबारी चौराहे के चौपड़ में 
नज़मा दिन भर बैंक के सामने बैठी रहती है

बैंक के आगे बोर्ड लगा है
'चलकर आइये, चलाकर ले जाइए'
दिन भर भीड़ लगी रहती है 
जन संपर्क अधिकारी ग्राहक से दुगना हँसता है
"हाँ सर्दियों की धूप  
चाय की चुस्की लेते हुए अच्छी लगती है"
बैंकों के अब सोफे लगवाए हैं. 
आवास, शिक्षा, इंशोरेंस , ऍफ़ डी सब है
बस आपकी कुव्वत क्या है

नज़मा आत्मविरोध में विज्ञापन करती है
"बैंक दे देता है इतना सब कुछ
मैं क्या दे सकती हूँ - सिर्फ बच्चा !"

"मेरी बस ग़लती इतनी 
ज्यादा उम्र नहीं है मेरी 
आंसू अब सूख चुके हैं
हजारों बलात्कारों से निकला बच्चा 
भूखा, गोद में पैर पटकता रहता है
दूध भी अब नहीं उतरता
अंतर्वस्त्र नहीं समीज के नीचे 
हवलदारों, रेड़ी वालो को सहूलियत इतनी
अँधेरे में जल्दी हो जाता है"

कभी कभी चली जाती है मंदिर में 
शिवलिंग से गलबांही कर पूछती है
या खुदा ! बलात्कार से आये बच्चे से मुहब्बत क्यूँ मुझे ?

श्रीमान ! नज़मा आत्मविरोध में विज्ञापन करती है
"नज़मा और शिवलिंग !
मैं धर्मनिरपेक्षता तो नहीं सिखा रही ?"

कभी कभी मन होता है कहने का उससे
नजमा, तुम भी इस कारोबारी चौक पर 
जिस्म का कारोबार कर लो तो अच्छा है.

लेकिन नज़मा तो आत्मविरोध में विज्ञापन करती है ना सर!

Saturday, October 8, 2011

हमने प्यार को धोखे से चरस खिलाया था



जब भी ज़मीन भारी लगे
हफ्ते भर सर दर्द तारी रहे
गैलन गैलन आंसू रो 
और वो आसमान में घुलता लगे

कोई आहट चुपचाप गुज़रा करे
गौरैये की चहचाहट में उनके कंठ सूखे लगे
गुस्से में कविता लिखने बैठो तो 
सालता सा प्रेम गीत लिखा करो

सहेलियों संग कोफी पीते हुए
गायब हो चुके मुहासों के तार पकड़ 
बगल वाली आंटी 
तुम्हारी बढती उम्र के बायस सवाल पूछा करे 

सो कर उठते ही थकान महसूस हो
जीभ को बुखार हुआ करे
डेरी मिल्क देख मुझे तुम्हारी कमर की महक याद आये
तुम्हारे लिबास का कोई धागा उधडे तो
मेरे कुरते का बटन याद आया करे
गिरती शाम में जलाऊं अगरबत्ती तो 
अफीम रोशन हुआ करे 

नुक्कड़ पर खाओ गोलगप्पे तो 
गैस लाइट के पीछे मैं खुल्ले पैसे जोड़ता दिखाई दिया करूँ
तब पागल हो
जाम लगे चौराहे पर के हर ऑटो में चढ़ना
मारी मारी फिरना

हमने प्यार को धोखे से चरस खिलाया था
रोज़ पूल पे उबकाई करता दीखता है

मैंने आज छक कर शराब पी 
और बहुत तबियत से तुम्हारे हिस्से की भी नमाज़ पढ़ी 

Monday, July 25, 2011

परखना शीशे को


आखिरकार हमें अपने दिल में ही सबकुछ समेटना होगा
अगर मुहब्बत होगी तो वादी में बिखेरनी होगी
जुल्फों में भंवर बना कर जब हवा छूटती है. 
बालों का वो गुच्चा जो पुरसुकून इश्क का थक्का है
मिलानी होगी फिजा में

जो गिटार दफ़न कर कस कर चेन खिंच दिया हमने
कुछ तड़पती, कसमसाती, रह गयी बात 
साज की बारीक तारों पर चढ़ते चढ़ते फिसल कर रह बेबस रद्दो-अमल 
अगर सामन ना हुआ तो 
आखिरकार हमें अपने दिल में ही सबकुछ समेटना होगा

उजली उजली किरणें ना हुई तो
बोरे में भरने होंगे शाम होते ही फूटपाथ से सामान
बोझ जो यहीं से उठाये
ढो कर फिर से ले जाने होंगे

मौत हुई है या नहीं जब जांचने प्यार लौटेगा
तो पहला जामुन माफीनामे का डालेगा 
धैर्य जब काठ की कुर्सी पर बैठा बिजली के झटके खा खा कर जाता रहा होगा
तो बरसों बाद
छूटी हुई प्रेमिका पत्रकार बन ताज़ा समाचार तलाशेगी

निर्लज्ज होता है यथार्थ का वह समय
जब पहली प्रेमिका आपको कुछ नए नाम सुझाती है
(जैसे पसंदीदा काम ना मिलने पर लोग बहुत से बेगैरत काम करने लगते हैं)

ऊँचाई पर खुली खिड़की से देखती आँखें कहेगी
आखिरकार हमें अपने दिल में ही सबकुछ समेटना होगा

Tuesday, July 19, 2011

छायाप्रति


तुम 
तुम रेल की तरह गए 

मैं 
प्लेटफोर्म की तरह यकायक खाली हो गया

तुम साथ थे तो 
झटके में एकबारगी मेरे कंधे पर हाथ रख दिया था
मैंने भी ऐसा करने की सोची
विचार शिष्ट था 
मगर मैं शिष्टाचार में खोया रह गया
और तुम बढ़ गए...

सभ्य सोच और अशिष्ट व्यवहार की लड़ाई अधर में रह गयी. 

तुम्हारे साथ 
स्टेशन पर इस बड़ी वाली घडी से मुझे डर नहीं लगता
बल्कि मैं एक धड़कते शहर में दिन दर्ज करता 
खुद को एक इतिहासकार महसूस करता हूँ. 

तुम्हे जाता देख 
रेल का खिसकना, पैरों तले ज़मीन का धसकना था 
होशो-हवास में अपनी किडनी निकलते देखना था 
चार आँखों में पानी का पारा चढ़ना था.

तुम्हारे जाने के बाद 
देर तक सूने प्लेटफोर्म पर बैठा रहा
सारा शोर ख़त्म हो चला है
स्टेशन के सारे नल अब सूखे हैं
उलझे से पटरियों पर काले-काले मोबिल गिरे हैं.
बड़ी वाली घडी ठहर गयी है

एक बेकार सी समझदारी उग आई है हम दोनों के बीच
जिन दिनों मैं तुमसे लड़ता था;
बेहतर कवितायेँ लिखता था. 

Thursday, June 2, 2011

कविता आना चाहती है




कविता आना चाहती है

कविता आना चाहती है...
एक विशाल भू भाग से उठ कर, सघन क्षेत्र में
यह विविध रंगों का मिश्रण हो एकाकार होना चाहती है.
सातो रंग मिलकर श्वेत होना चाहती है.

ऐसा नहीं है कि कविता लिखी नहीं जा रही इन दिनों 
कविता आ रही है 
जिसके आगमन का वेग तीव्र है
मगर इस थपेड़े में हम स्वयं गुमशुदा की तलाश में हैं

कविता इन दिनों 
कई शक्लों में आ रही है 
इनमें कविताओं ज्यादा कवियों का अपना बनाव श्रृंगार है.

कविता आ रही है 
मगर इसकी गति हमें कहीं पहुंचा नहीं रही 
इन दिनों कविता मेट्रो रूट की ट्रेन पकड़ने जैसी है
जहां हर स्टेशन यात्रा की शुरूआत है.
आप किसी भी पंक्ति से शुरू कर सकते हैं 
आप कहीं भी खत्म हो सकते हैं
(फिर चाहे मैं भी क्यों न होऊं)

कविताएं आ रही है इन दिनों भी, 
लेकिन शिल्प कुछ यूं है कि किसी महाकवि ने प्रणेता बन
महाकविता लिखी और 
अंतिम पंक्ति में  एक कोष्ठक डाल (....) उसे रिक्त छोड़ दिया
महज युवा कवियों से ही नहीं भाषा के जानकारों से उम्मीद की गई थी कि
कविता अपने शिल्पों में समृद्ध होगी।

महाशय,
नहीं मंतव्य था उसका और 
ना ही कहा था कहा भी था तो इस संदर्भ में नहीं कि 
रिक्त स्थानों की पूर्ति करो.

मगर आज कविता उसी रिक्त स्थान की पूर्ति करता ज्ञात होता है.

मित्रों 'अ' पर हाथ घुमाते घुमाते अब यह वर्ण मोटा हो चला है.