बारिश एक दुःख है


दो मकानों के बीच कोई हथकरघा रखा है
आसमान से उजले तागों के लच्छे गिरते हैं।
दीवार के कंधों पर बूंद गिरकर फूट जाती है

बारिश एक दुःख है
आलते का पौधा इसे नहीं समझता
घर में हुए अकाल मौत पर भी
बच्चे सा खिलखिलता रहता है
व्यस्क हो रहा तना
जीवन के दूसरे मायने भी समझता है
उम्रदराज कदम्ब से दर्द टपकता है।
लैम्पपोस्ट से अवसाद रिसता है।

सूखा ज़मीन जीवन सा है
जम रहा है चहबच्चों में पानी
दरकने लगता है कभी ठोस मानस पटल किसी के लिए
बारिश मनरंजन करती है।

अवरोधक के कारण हम जान पाते हैं बारिश का स्वर
वरना तो ये बेआवाज़ रोती है
इश्किया कविता में झंकार है बारिश
दर्द भरी कविता में अलंकार है

9 टिप्पणियाँ:

Prakash Govind said...

अर्थपूर्ण उत्कृष्ट रचना
बहुत बहुत बधाई

आभार

प्रवीण पाण्डेय said...

चाह धरती सी, प्रकृति बस बरसती रहे।

Yashwant Mathur said...

आज 08/008/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

अनुपमा पाठक said...

'ये बेआवाज़ रोती है'

बारिश को दुःख कहते हुए उसका रुदन भी सुना गयी कविता!

वाह!

expression said...

वाह....
एक बेहतरीन कविता!!!!

अनु

गौतम राजरिशी said...

तुम्हारी याद आयी जाने क्यों, तो चला इस जानिब । सुधरे नहीं हो अब तक... अलाय बलाय लिखे जा रहे हो

Anonymous said...

http://azdak.blogspot.in/2013/08/blog-post_18.html

एक सागर की गहराई की...एक कविता सुख की हो.

PoeticRebellion said...

शब्द कि इस मर्म को .... मैं यूँ समझ कर आ गया …
अल्फाज पढ़ के यूँ लगा .... खुद से ही मिल के आ गया ....

बहुत खूब ....

बहुत सालों से ऐसा नहीं पढ़ा। ।

Swarda Saxena said...

wonderful