खुदा या!


उमस के इसी मौसम में
जब जज़्बात के बादल;
बगावत कर घनेरे हो जाते हैं
फिर भी बरस नहीं पाते हैं...

ऐसे में कभी तुम तक
पहुँच जाते थे;
कच्ची पेन्सिल से लिख्खे
मंद सांसें लेते ख़त...

हर्फ़ भारी होकर तब
मेरा चेहरा उगाया करता था;
और मेरे हाल से
तुम्हारे दिल पर जमा मेघ भी
घुमड़ कर
तर कर जाता था,
तुम्हारा दामन

यही ख़त जलावन बनाकर उड़ेलता जाता मैं
और तुम्हारी अंगीठी सुलगने लगती;
दुनिया चैन से सोती
हमें मिल जाती,
कई रातों की खुराक...

तब ये आग भी चुपचाप जलता था

आज... वो
गोपनीयता भंग हो चुकी है पर
शुक्र है;

...'ब्लॉग' पर अब मेरा
मायूस चेहरा नहीं उभरता होगा...

6 टिप्पणियाँ:

Kumarendra Singh Sengar said...

chaliye google ke karan aap lekhak ban gaye. rachana achchhi lagi.
kya aap apne lekhak ko ham tak pahunchayenge?
SHABDKAR par apni rachnaayen chhapne bhejiye.
shabdkar@gmail.com
http://shabdkar.blogspot.com

awaz do humko said...

bahut achcha

Reshu said...

aap day by day aacha likh rahe hain main bata nahi sakti ki mujhe kitni khusi ho rahi hai. Go ahead.

mehek said...

हर्फ़ भारी होकर तब
मेरा चेहरा उगाया करता था;
और मेरे हाल से
तुम्हारे दिल पर जमा मेघ भी
घुमड़ कर
तर कर जाता था,
तुम्हारा दामन
bahut hi achhe lage ye ehsaas bhi,sunder rachana.

डॉ .अनुराग said...

आओ खोदे अपना अपना अतीत हम.....ओर दफनाये फिर से नयी कुछ यादे ..

लता 'हया' said...

thanks.
ur khudaya is good.

haya