माँ...


अलग-अलग दिशाओं में
छह लगभग सीधी लकीरों पर;
चाँद उगकर रोशनी करता है जब
तब उगता है
नाम तुम्हारा !

यह छः लकीरें नही संबल है
और यह चाँद इसे खूबसूरत बना रहा है...

परिचय का मोहताज़ नहीं,
ना ही
तालमेल बिठाने की रस्साकशी...

अनपढ़ रहकर
मुझको सिर्फ़
इतना ज्ञान दिया कि
तुम वस्तुनिष्ठ हो, सर्वनिष्ठ भी

मुझे नही लगता
तुम्हारे
शिराओं से रक्त गुज़रता है ?


...तेईस साल से
मैं हिज़्ज़े सुधार रहा हूँ;
तुम मायने समझा रही हो...

अब तलक...
''माँ...'', मैं तुमसे प्यार नहीं करता''


--- 'सागर'

6 टिप्पणियाँ:

Reshu said...

Bilkul bhi samajh main nahi aaya.
kaise likha hai. Na title aur na hi poem samjh aa raha hai. apni thought ko explain kijiye.

सागर said...

रेशमा जी,

इन छः सीधी लकीरों का मतलब 'माँ' लिखने से है.

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत गहरे अर्थ लिए हुए रचना। अलग से शब्दों से अपनी बात कह दी आपने। मैं हमेशा कहता हूँ कि "माँ तो माँ होती है।" उनके बारें में जितना भी लिखा जाए वो कम ही होगा। पहली बार आया शायद आपके ब्लोग पर और पहली नजर में ही दिल जीत लिया। अब आना जाना लगा रहेगा।

नीरज कुमार said...

अच्छा है लेकिन कड़वा है...

''माँ...'', मैं तुमसे प्यार नहीं करता'
कठोर उदगार हैं...

Reshu said...

Ab bilkul samjh main aa gaya hai. wah wah. explain karna muskil to hai par aacha kiya hai Maa.. ko.

vandana khanna said...

...तेईस साल से
मैं हिज़्ज़े सुधार रहा हूँ;
तुम मायने समझा रही हो...

अब तलक...
''माँ...'', मैं तुमसे प्यार नहीं करता''.....