रश्क

देर रात कांच के ग्लास में
शराब उड़ेलते हुए
जब मेरे दोस्त
खोलते है तुम्हारे नाम की
लाटरी
तो दिन भर का हारा
यह 'सख्त जान'
रेशम के गिरह की मानिंद खुलने लगता है

एक लहर उठाता है
तुम्हारा नाम
रूह में मेरे...

इनकार की
गुंजाईश देख
वो डालते है बर्फ शराब में

वो जानते हैं की तुम्हारा नाम
घुल रहा होगा अब मेरे जेहन में

निगाहें तेज़ करके देखते है
शिकने मेरे पेशानी की
और दर्ज करते जाते हैं
मेरी हरेक हरकत...

कहीं से उनको यह खबर है कि
मैं जाम से नहीं तुम्हारे नाम से टूट रहा हूँ

पहले हमारे इश्क से रश्क था उनको
अब इस एहसास ने वो जगह ले ली है

6 टिप्पणियाँ:

डॉ .अनुराग said...

गजब कहते है इसे ......हमारी भाषा में ....

Reshu said...

Ishq Mohabbat k baad hi sahi shayad kuch rishte aur hote hain us ajnabi rishte aur hamare samaj aur desh duniya main aur bhi kai gambhir samasayain hain un par kuch try kyu nahi karte. "wah torti pathhar" se kya kabhi un majdoron ki yaad nahi aati jo................
Ummed hai is par aap jarur kuch sochyenge.....

swamiadbhutanand said...

bahut khoob
ehsaso ne sachchaae se isk ko dil me paaya hai .mehboob ho na ho muhabbat ko wahan paaya hai.

swamiadbhutanand said...

aapke is kavita ne hridaya me prem kee lahariyan jaga dee.aapne sachche isq ko bayan kiya.
harih oum

poemsnpuja said...

इसकी तारीफ़ मेल कर के बतौंगी :) यहाँ बस बता रही हूँ की सनद रहे.

Puja Upadhyay said...

अद्भुत...अतुल्य...अवर्णनीय
सागर.

....
तारीफ करने पर कर्फ्यू लगा दो.