हमारी रगों में अब आखिर बहता क्या है



उधेड़बुन में तपता आदमी
तकता है-
कमरे का शांत आकाश, तलाशता है-
भारहीनता का अनुभव,
घुटा हुआ सन्नाटा,
खोया हुआ स्पर्श
औ' दौड़ता हुआ खून.

जलावन जब जलने को होती 
नहीं बचती चूल्हे में राख भी 
हम कुरेदते थे पकाने को मांस
अंगीठी को हँसते देखे जमाना हो आया

पीर की मज़ार पर बाँधा किये 
मन्नत के धागे
और उठ कर खामोशी से
नाप डाले कई किलोमीटर
बस स्टेंड अब गली के मोड़ पर है 
हम चलना भूल गये.

इन्ही दिनों भूख सिपाही बनकर 
खोंचता था डंडा,
सांत्वना देती थी माँ,
दिलासे देती बहनें,
और उकताए हुए हम
पंचायत के फरमान सुनते थे

हर लिखा पढकर लगता है
यह वो नहीं था जिसकी हमें तलाश थी
कवि, मन का मर्म पहचानने में
असफल हो रहा है.

अब ना आते हैं राष्ट्रवाद के सपने,
ना उत्तेजित होते हैं हम
बगैर प्रेम किये ही देखते हैं धोखे के अनंत रूप

कंक्रीट के जंगल में,
उखड़ते पलस्तर की खुशबू नहीं आती
पसीना भी मेहनतकश जैसा नहीं लहलहाता
चोर सा रिसता रहता है.

हमें खाए जा रहा है रात-दिन यह सवाल
हमारी रगों में अब आखिर बहता क्या है !

कवि कह गया है -9



बचपन, मिथक
चाँद- मामा, बुढिया, चरखा, सूत,
गोदी, लोरी.

मीठी लड़की, मिसरी धडकन,
सीने और तकिये की बातचीत,
करवट, रतजगे, फुर्सती वादे,
खत, चाँद, चोकलेट, बहलावा,
राख !

डर, बीमारी, अतीत
यादें, अनहोनी
धोखा, बुखार

सपने, कारनामे, कीर्ति,
क्रांति, बदलाव, स्वर्णिम भविष्य,
गौरवशाली इतिहास
देश, आधारशिला

कुपोषण, न्याय
कुर्ते, कुर्सी,
गिरफ़्तारी, भूख, यातना
स्टेशन, डंडा, कुर्की-जब्ती, जेल
-.......- मुजरिम !!!

नौकरी, महीना, वेतन, जीवन- शैली,
पुरखें, संदूक, विरासत
रिश्वत, दलाली,
आटा-दाल, मसाला, सब्जी

भांग-शराब, ब्लू फिल्म,
पसीना, औरत, देह गंध, गर्माहट, संसर्ग सुख
बेहिसाब गिनती के सिर

अकाल, बाढ़, ठिठुरन, जून
कटे गर तो नदारद खून
‘आलीशान बंगला;
दकियानूस जंगला’

जिंदगी ! यथार्थ, हालात, गवाही, भलाई, मजबूरी, ठीकरा

अक्सर हम अपने पूर्वाग्रहों के बल पर लिखते हैं कविता

कवि कह गया है - 8



साफ़ मझोले बर्तन में पानी का आकार लेना,
चलते-फिरते गायब हो जाना,
विदाई के आखिरी क्षणों में अपनी वसीयत कर देना,
अपने हाथों अपना अंतिम संस्कार करना,
जैसे तुमसे प्रेम करना.

किसी संप्रभु राष्ट्र के राजपथ पर मार्च करना,
सम्भोग के बाद संतुष्टि की मुस्कान आना,
घोर पाप के बाद ईश्वर के सामने अंतिम श्लोक का बुदबुदाना; त्राण माँगना
जैसे तुमसे प्रेम करना.

जीवन पर्यंत सपनों से पार ना पाना,
पाठशाला के मुख्य द्वार पर ठोकर खाना,
फनफनाती शराब में अपना जीवन गर्क करना,
फकीरों की तरह तीनो जहां दुआओं में देना,
कव्वाल का कव्वाली गाना,
जैसे तुमसे प्रेम करना.

जलती चिता से आग ले बीड़ी सुलगाना,
बागी का बगावत करना,
क्रांतिकारी का तत्कालीन समय में शहीद होना,
फिर इसे इतिहास की किताबों में पढ़ना
जैसे पुनः तुमसे प्रेम करना.

तत्वज्ञान


हठात !
दृश्य देखा मस्तिष्क बुद्धिमान  
वास्तविकता, 
मरुभूमि में यत्र-तत्र गिरती 
बिजली

विप्र!  क्या प्यास
उन्मत्त, बेकल 
पारस रेखा 
हरे नोट में चांदी धागा 

पहचान 
वेद, उपनिषद प्रकाण्ड विद्वान 
स्वांग, प्रदर्शन, अर्पण 
पुनश्च:
घूर्णन 
समर्पण 
सर्वश्व समर्पण

शमशान
स्वागत उदघोष
निर्लज्ज ! निर्लज्ज !

हिंसा


सच बताओ
बाहर जो शोर है 
उसमें तुम्ही हो ना ?

तुम्हीं थे ना !
उसकी पृष्ठभूमि में, कार्यान्वयन में,
और
अब बरपे क्रंदन में ?

मैं विश्वास दिलाता हूँ
नहीं काटे जायेंगे तुम्हारे हाथ, 
ना ही कोई कालापानी होगा
गर फांसी हुई तो कृपया मासूम बने रहना बस
... अभयदान मिल जायेगा.

तुमने कोई २ बरस की बच्ची के साथ बलात्कार थोड़े ही किया है ?

मैं  इस कृत्य के लिए तुम्हें 
हाशिये पर के लोगों की दुहाई नहीं दूंगा.
मुझे नहीं लगता कि
किसी जिम्मेदारी के एहसास के लिए 
तुम्हें कहीं से कमजोर किया जाये

पर यह बताओ 
वो जो ज़मीन पर हाथ पटक रहा है,
जिसे अभी बोलना तक नहीं आया,
जिसके मुंह से 
चुइंगम जैसे गिरते-गिरते लार 
हलक सुख गयी है.
औ'
आँखों में कोई दरया रुका पड़ा है...
इसके पीछे भी तुम्ही हो ना !

हुम्ह!
बेवजह लोग चित्रकार को पुरस्कृत करते हैं
असल में,
इन चित्रों को तो तुमने ही खींचा है.

कवि कह गया है – 7


गवाह बोलते हैं-

हाँ!
गज़ब का ज़हीन था
पर मर गया

बचपन से
आसमां पैमां बनने की ख्वाहिश पाले
संभावित सायेदार पेड़ जैसा खड़ा
सामने के बाड़े में अपने उतरने की
प्रतीक्षा में रह गया.

गज़ब का ज़हीन था
पर मर गया

इश्क का खौफ यूँ था कि
चैन से ब्लू फिल्म देखना मुहाल था
कहता;
नायिका के शक्ल में प्रेमिका दिखती है

बाहर ही बाहर
वक्त ने इतने निर्णायक फैसले सुनाए कि
अपनी मिटटी में धंस गया

गज़ब का ज़हीन था
पर मर गया

झुर्रियाँ, एक दूसरे को फ्लाई ओवर की तरह काटती थी
सनक में लिखता था,
झोंक में चलता था,
आज़ादी के लिए मरता था,
आज़ाद होकर बोलता था,
खुद को छुपाता था पर
भेद खुल ही जाता था
पुर्नजन्म में यकीं न था
यूं मीठा ज़हर चखते-चखते मर गया

गज़ब का ज़हीन था
पर मर गया

वो जीने के लिए उतारा गया था
लेकिन मर गया.

कहता था
"योग्यताएं पर्स में पड़े कंडोम जैसी होती हैं
गर समय से प्रयोग न आए तो
'उठते-बैठते' क्षतिग्रस्त हो जाती हैं"

सर्प-दंश

स्नेह !

उठो

आ कर मुझे बहरूपिया बना दो


हिंसा, आतंक, आम आदमी, जनता, सेवा !

आओ

मेरे जिह्वा पर विराजो

मुझे इनकी दुहाई देते खाना है


विस्तार !

तुम्हें तो मौके देख कर पहनना होगा मुझे


मेरे अभिमान,

मुझे किसी ऊँचे पत्थर पर ले चलो

वहाँ से फीते लटका मुझे वर्तमान स्तर

जानना है.


प्रेम

मेरे सबसे जिम्मेदार चोले !

मुझे नाचना सिखला दे


चाह!

मुझे छुपा सत्य बतला दे

मैंने जो प्रेम बांटे हैं

उसमें कितने कांटे हैं ?


मैंने लिफाफों से कहा है;

खत,

खुलो मेरे पास

जला कर राख करना है तुम्हें

अभी

अपनी विनम्रता की आग में