पिता : अयोग्य श्रेणी के श्रेष्ठ पुरुष




जब तुम सोये रहते हो चादर में लिपटे हुए बेसुध से, 
मुंह हल्का सा खुला रहता है 
और थोडा सा लार तकिये से ढलक जाता है 
तुम इस लोक में नहीं लगते हो.

थकान की पराकाष्टा में गहरे डूबे खर्राटे की आवाज़ आती है.
किसी नाटे कद के रिक्शेवाले की तरह लगते हो 
जिसने हाँफते हुए हाफ पैडल मार - मार कर रिक्शे को गंतव्य तक पहुँचाया हो
लेकिन मुझे यह कहने में तनिक भी गुरेज़ नहीं कि 
तुम बहुत गरीब आदमी हो... 

यह तुम्हारा कहना होगा कि तुम सताए हुए हो 
तुम्हारे चिकने से माथे पर जाने कितने शिकनें हैं जो तुम मुझसे छुपाते हो. 
        (माथे पर पगड़ी बाँधी जा सकती है,  बाजू नहीं)

तुम धोती पहनते हो तो एक पल के लिए सभ्य हो जाते हो 
एक आदर्श धर्मपिता की प्रतिमूर्ति...
तुम्हारी शारीरिक भाषा कुलीनों की सी लगती है 
एक प्रकाशमान दिव्य मणि का आकर्षण 

लेकिन जिस पल तुम बेबस होते हो बहुत दयनीय हो जाते हो.
तुमसे बड़ी निर्दयता ज़माने ने दिखाई है. 
यह तुम्हारा सच होगा.

हुआ है ऐसा भी कि तुम्हारे स्पर्श में था 
सर्द श्वेत बर्फ के बीच थोडा सा गाय का पीला, गर्म पेशाब जैसा तत्त्व
जिसपर धूप गिरती थी तो दिन ताप चढ़ता था
पीठ का दोहरा हो जाना समझा है 
धनुष सा लचीला होना देखा है.
और चौड़ी छाती पर चढ़े हुए अनाज को सीझते चखा है.

निर्विवाद बहस नहीं किया जा सकता तुमपे 
मैं सोच सकता हूँ कि तुमको ओढ़ लूँ, पहन लूँ, 
कुरेद कर तुममें वो सारे गुण निकाल लूँ जो छिपे रह गए 
जिसे तुमने किसी महान लक्ष्य को फलित होने के वास्ते अपने में संजोये रखा.. 
जो अलक्षित  रह गए
जो सध नहीं सके 

आज जब मैं बहुत गहरे असफलता की तली में बैठा 
एक अभागे पिता पर कविता लिख रहा हूँ 
तो कल आक्षेप लगने की संभावनाएं भी बढ़ जायेंगी
मैं नहीं लिख सकता तुम्हें दुनिया का सबसे अच्छा पिता
सबसे अच्छा आदमी
सबसे ईमानदार व्यक्तित्व 
सबसे योग्य प्रेरणाश्रोत

बहिष्कृत अयोग्य श्रेणी के श्रेष्ठ पुरुषों में तुम भी एक हो 
आज जब तुम देखना चाहते हो बहुत बेचारगी से मेरी तरफ 
किसी उम्मीद (दया) में तो 
सावधान ! मेरे पिता 
तुमने बागी पैदा किया है
एक क्षण के लिए भी मत भूलना 
कि तर्क, सत्य और बुद्धि की कसौटी पर सबसे पहले 
तुम्ही कसे जाओगे 
और यही तुम्हारी पहली और आखिरी सफलता होगी. 

11 टिप्पणियाँ:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

यार, मुझे बहुत भावुक कर गयी तुम्हारी कविता..

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

सागर..
थैंक्स फ़ॉर दिस वन..

त्रिपुरारि कुमार शर्मा said...

शुक्रिया !
हमेशा की तरह बेवाक़...

(वैसे आज आपके पिताजी से मेरी बातचीत हुई है)

उस्ताद जी said...

4/10

कविता में संवेदना है .. भावुक करती है किन्तु रचना की प्रस्तुति अनुवादित लगती है

प्रवीण पाण्डेय said...

विषय व अभिव्यक्ति का नया प्रयोग, बहुत सफल। पढ़कर अच्छा लगा।

डॉ .अनुराग said...

एक कंट्री सोंग है सागर ...मालूम नहीं किसने गया है शायद केनी रोज़र्स ने ....वो कुछ यूँ है ....के जब मै खुला दरवाजा ओर टी.वी ऑन करके सोफे पे सो जाता हूँ .तुम ..टी वी बंद करते हो .ओर दरवाजा भी ....फिर जाते जाते मुझे चादर उड़ाते हो ..पापा मै तुम्हे मिस करता हूँ.....

prkant said...

बहुत ही उम्दा कविता.
पिता ही पहला व्यक्ति होता है जिसके विरुद्ध विद्रोह किया जाता है.

डिम्पल मल्होत्रा said...

कविता में पिता कुछ नहीं कह के भी बहुत कुछ कह जाते है..दो पीढ़ियों के मनोभावों को समेटना और फिर ईमानदारी से समेटना एक कठिन कार्य है...एक उत्कृष्ट कविता...

Avinash Chandra said...

बन्धु...पिता सफल हुए दिखे हैं.

नीरज बसलियाल said...

सही कहते हो सागर...
सबसे पहले विरोध .. या विचारों का टकराव पिता के साथ ही होता है|

मार्क ट्वैन ने कहा भी है कि जब मैं १४ साल का था तो मुझे अपने पिता के अज्ञान पर बहुत गुस्सा आता है, और जब मैं २१ साल का हुआ तो मुझे बेहद आश्चर्य हुआ कि इन ७ सालों में उस बूढ़े आदमी ने कितना कुछ सीख लिया |

"When I was a boy of 14, my father was so ignorant I could hardly stand to have the old man around. But when I got to be 21, I was astonished at how much the old man had learned in seven years."

वक़्त हमें भी कसौटी पे कसता है|

अल्पना वर्मा said...

पिता पर माँ की तुलना में कम ही कवितायेँ देखी हैं..आप की यह कविता भी बेहद अच्छी लगी.