लालसा...


गुलाबी सर्दियों के मखमली सवेरे में,
मुलायम कम्बल में फंसी तुम
बे-इरादा याद आ जाती हो

संसर्ग के बाद चूड़ियों से खेलना बनकर,
कमीज़ पर करीने से की गयी इस्त्री बनकर,
फिर से सम्भोग की ख्याल जगाती,
वो बालाई लम्स बनकर

सर से पावं तलक तुम्हें नापने की लालसा
एक धुर विरोधी छोर पर कैद ये कैदी
महज़ तुम्हें सोचते हुए,
कई साल गुज़ार देता है...

मेरी सारी इन्द्रियां थकी-सी जान पड़ती है...
एक मुद्दत हुई
तुमने शरारत से मेरे कान नहीं काटे
जीने का हौसला देता आलिंगन कहीं खो गया...
तेरे मसामों में मेरे उँगलियों के पोर नहीं थिरके...

तुम्हारी पीठ की आंच से आज भी कटती है मेरी सर्दी
पिघलते मोम से तेरे लबों का स्वाद आता है
सरेशाम झींगुर पायल की आहट देते हैं...

गरम लिबास बना कर पहन रख्खा है तुम्हें.

चलो,
मुझे मानसिक रूप से विछिप्त ही मान लो...
सिगार सुलगा ली मैंने
...तुम्हारी तलब लगने लगी है.

21 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा said...

अंतरंग से बहिरंग की ओर- मुझे अच्छी लगी आपकी कविता-शानदार अभिव्यक्ति

डॉ .अनुराग said...

गुलज़ार की एक नज़्म याद आ गयी सागर .सच कहूं तो यही असल ब्लॉग लेखन है .बेलौस .बिंदास....बिलकुल .सच जैसा .रूमानियत भरी हुई...इत्ती की बुकमार्क करके रख ली है

नीरज गोस्वामी said...

गरम लिबास बना कर पहन रख्खा है तुम्हें

वाह...अछूते शब्दों का क्या खूब प्रयोग किया है आपने...एक जिंदादिल रचना...कमाल.
नीरज

Apoorv said...

सागर साहब आपकी एक जो बात बहुत आकर्षित करती है मुझे कि बाहरी आग, पानी या हवा की जरूरत नही पड़ती आपको अपनी लेखनी को निखारने मे..अपने अन्दर की आग, पंचतत्वों को ही मथ देते हो आप..बेलाग, ईमानदार और एक्दम २४ कैरेट की शुद्धता..बिना किसी डाइल्यूशन के...आपकी कलम को दूसरों से अलग करती है..
..यह भावनात्मक ऐन्द्रिकता, उन्मुक्त लालसा और विक्षिप्त सी तिश्नगी निधि है आपकी कविता की..
अनुराग सर की मोहर के बाद अब और तारीफ़ क्या करूँ..हाँ पढ़ कर सोच रहा था कि किसे टक्कर दे रहे हो आप..अशोक बाजपेई या पाब्लो नेरुदा...मगर यह पंक्तियाँ ’सागर ब्रांड’ को अलग करती हैं सबसे..

एक धुर विरोधी छोर पर कैद ये कैदी
महज़ तुम्हें सोचते हुए,
कई साल गुज़ार देता है...

..और आपको शीर्षक को कोई चटपटापन देने की जरूरत नही है..

सुलभ सतरंगी said...

प्रभावित किया है आपकी लेखनी ने
इसलिए की आप सहज रह सरलता से सारे भाव बखूबी लिख रहे हैं.

Anonymous said...

एक धुर विरोधी छोर पर कैद ये कैदी
महज़ तुम्हें सोचते हुए,

अनुछुए प्रतीकों का प्रयोग सबसे बडी खूबी है , आपके कविताओं की ...

अर्कजेश said...

एक धुर विरोधी छोर पर कैद ये कैदी
महज़ तुम्हें सोचते हुए,

अनुछुए प्रतीकों का प्रयोग सबसे बडी खूबी है , आपके कविताओं की ...

"हमारी ही टिप्पणी है , गलती से Anonymous select हो गया था । :)"

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

इतने सुन्दर शब्दों का प्रयोग !!!!! आप काहे को कहते हैं अश्लील????

अम्बरीश अम्बुज said...

bahut acchi rachna.. par aise sheershak ka auchitya nahi..

ओम आर्य said...

गुलाबी सर्दियों के मखमली सवेरे में, मुलायम कम्बल में फंसी तुम बे-इरादा याद आ जाती हो

बे-इरादा इतना कुछ हो रहा है, पता नहीं इरादा करें तो क्या हो!!!!!!!!!!

ये क्या लिख दिया आपने,, लोग किसी और ब्लॉग पे जायेंगे ही नहीं दो चार दिन तो !!!

अनूप शुक्ल said...

गरम लिबास बनाकर पहन रखा है। क्या-क्या कल्पनायें है। वाह!

Anil Pusadkar said...

ईमानदार खयाल और ईमानदार इज़हार।शानदार बस सिर्फ़ यही कहुंगा शानदार्।

गौतम राजरिशी said...

फिलहाल बस इक "उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़" से काम चला रहा हूँ ... और जा रहा हूँ वापस आने के लिये!

कुश said...

तो आखिर लिख ही डाला.. और क्या खूब डूब के लिख डाला है.. अश्लील और बोल्ड में फर्क बताया तो था.. भूल गए?

Satya.... a vagrant said...

ek baar jhankne ki dhristhta ki thi. fark yeh tha ki bus kambal ki jagah lihaf tha.
baki yeh kavita ( bhawnatmak roop se ) meri hai. or ise ashlil kahne ka adhikar apko nahi hai

satya

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत खूब!!

रवि कुमार, रावतभाटा said...

बेहतर...
एकाध गैरजरूरी शब्दों को छोड़ दें, तब भी यही आसानी से कहा जा सकता है कि बेहतरीन...

नसों में घुसने की कोशिश करते हैं आप...

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

रचना एक बार पढ़ चुका था, टिप्पणी के लिए थोडा समय चाहिए था, पुनः आया तो शीर्षक बदल चुका था....


सागर जी, शब्द ईमानदारी की मांग करते हैं..अपना एहसास लिख पाना ही तो 'कुछ लिख पाना' है..
आप सफल हैं..!

कविता को किसी कैटेगरी में रखना जरूरी नहीं, कविता किसी खास वर्ग में रहने के लिए लालायित नहीं...बस आप लिखते रहिये..

"...जो महसूसो, लिखो यार.."

गौतम राजरिशी said...

फिर से आया था "लालसा" पढ़ने-देखने-महसूसने...

"तुम्हारी पीठ की आंच से आज भी कटती है मेरी सर्दी"- ये मिस्‍रा मेरा हुआ!

सौरभ शर्मा said...

बहुत खूब
सागर में आग लगा देते हो....

दर्पण साह "दर्शन" said...

Saagar sa'ab kabhi suna tha gulzaar ko...

"cheer ke badan mera neekaal do"

aur aapke baare main ek baat jo sau fi sadi sach hai wo aapka kisi se inspire na hona...

mano 'Saagar' apne main ek btand name hai...


aur aapki ye poem khaas taur pe isliye acchi lagi kyunki...

....बाद चूड़ियों से खेलना बनकर,कमीज़ पर करीने से की गयी इस्त्री बनकर....

bade acche bimb banaye hai....
aur aankhon ke saamne ghoomne lagta hia sara kuch.
Maano kal ki hi to baat ho...
aur fir apne ko abnormal kehna...


चलो, मुझे मानसिक रूप से विछिप्त ही मान लो...सिगार सुलगा ली मैंने...तुम्हारी तलब लगने लगी है.
cigarette sulga li maine...