जहीर भूल गए ? तुम्हें आना था !

मैं याद दिला दूँ तुझे
जहीर तुम्हें आना था, वक्त पर
तुम्हारी अम्मा अकेले पी एम सी एच जाती है.

अफ़सोस है कि व्यक्ति एक ही है पर
पर तुम्हारे अब्बा से ज्यादा अपने शौहर का एहतराम करती है.

जहीर तुम्हें आना था ना
हाल्ट पर बिकते बासी लाल साग ही लिए चले आते
जहीर तुम्हें कुदाल चलाना था
उससे दिल की गिरह बैठे मिट्टी के साथ हल्का होता है.

जहीर तुम्हें अप्रैल में कोयल को चिढाना था
तुम दोनों में अंत तक हूकने की बाज़ी लगनी थी
जैसा सिद्धिकी (बहन) के साथ करते हो.

हारून के होने का ख्याल बुनना था 
(अगर संभव होता तो बड़ा भाई, जिसे गरीबी के कारण पैदा नहीं होने दिया)
जब भी घर आओ तो
तराजू पर तौलना था
अपने पिछले फैसले, 
क्या खोया और क्या पाया जैसे सवालों के जवाब
किसी पेड़ पर जूनून में लिखे मुहब्बत के नाम
जो अब खरोंच से लगते हैं
जहीर तुम्हें यह कबूलना था
वक़्त रहते.

जहीर तुम्हें कविता लिखना था,
जीभ उल्टा कर नाक पर चढ़ा कर मगन होकर 
लट्टू के दरारों में कस कर डोरे कसने थे
बाजू फड़का कर खुरदुरी ज़मीन पर घुमाते-घुमाते हथेली पर लेना था.


तुम्हें आना था ना यार, वक्त रहते 
तुम आ जाओ ना वक्त गुज़ारने, वक़्त रहते....

14 टिप्पणियाँ:

सागर said...

पी एम सी एच - PMCH - Patna Medical College Hospital

shahroz said...

prbhavi kavita...khoob likha..likhte raho bhai..

Kishore Choudhary said...

ज़हीर हम सब के भीतर सांस लेता है मगर उसे इस शिद्दत से कौन याद दिलाता है ? बहुत खूब !!

crazy devil said...

मगध में कमी नहीं है विचारों की...:)

रश्मि प्रभा... said...

तुम्हें आना था ना यार, वक्त रहते
तुम आ जाओ ना वक्त गुज़ारने, वक़्त रहते....
gahri baat

अनिल कान्त said...

Aah !!
tumhari kalam se hi aisi yaad nikal sakti hai

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (21-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

सञ्जय झा said...

leo bhai sagar....jahir 'aa' chuka...

aap to bas likhte raho....'jahir' aata jata rahega........

sadar.

Parul said...

waqt rehte...aapne yaad kiya hai to uska aana mukarr hai... :)
lekhan shaili anoothi hai!

prkant said...

पहली पन्क्ति में "तुझे" को दूसरी में "तुम्हें" में क्यों बदल दिया ? "तुझे" में जो अपनापन है वह "तुम्हें" में dilute हो जाता है.

Shah Nawaz said...

बहुत ही बेहतरीन अभिव्यक्ति!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गहन अभिव्यक्ति

Vivek Jain said...

बहुत सुन्दर
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

mkmISHRA said...

Wow!