बोबी में डिम्पल कपाडिया को देख तुमने भी आहें भरी थी.
एक विशेष कोर्ट का सम्मन झेला था
और साठ रुपये घर भेजते थे.
सूचना क्रांति ने एहसास में कोई इजाफा नहीं किया है
(हमपर बीते सारे हालात एक जैसे हैं)
तुम्हें प्यार नहीं मिला इसलिए
तुमने सबको अपने आकाश में समेटने की कोशिश की
तुम बांह कसते गए और लोग छूटते गए
मानता हूँ, तुम्हारी उँगलियों में ग्रीस नहीं था
चिकनाई उनपर ही जमी थी
(अभाव में पला बेटा कहता है)
तुम पचास पार ढल रहे हो
और मैं पच्चीस में लबालब हूँ
तुम्हें गिल्ट है नौकरी चले जाने का
मुझे धौंस तुम्हारी देखभाल का
(अब नौकरीशुदा बेटा दहाड़ता है)
तुम मेरे पेशे से सम्बंधित कोई खबर नहीं हो
जिसे मैं बार-बार रीवाइज़ करूँगा
सीधी सी बात है; शौकिया तौर पर मैं
आम आदमी पर कुछ कवितायें लिखना चाहता था
भावुकता और महानता बघारने से बचते हुए
जो आवारगी करते करते पिता होने को अभिशप्त हो जाते हैं.
(हाह ! अकेलापन छुपाने के लिए आदमी क्या नहीं करता है)
हम कितने सुरक्षित थे अपने गोदाम में
पर तुमने मुझे वहां से निकाल कर
हाई वे पर चलने वाले ट्रक पर चढ़ा दिया
(जिन पर गुड्स कैरियर लिखा होता है)
हम थोक में तो पैदा नहीं हुए थे ना, मेरे बाप !!!
(अंतिम चारों लाइन ईश्वर के लिए )
21 टिप्पणियाँ:
आम आदमी पर कुछ कवितायें लिखना चाहता था
भावुकता और महानता बघारने से बचते हुए...
कमाल है...
सम्बन्धों की गरिमा इस विशुद्ध आदिम विचार को ढक लेती है।
एकदम से फ़ाडू है सागर भाई ,,का लिखे हो यार
saagar sir.. adbhut kavita hai..... bahut bebaki hai...
आम आदमी पर कुछ कवितायें लिखना चाहता था
भावुकता और महानता बघारने से बचते हुए
जो आवारगी करते करते पिता होने को अभिशप्त हो जाते हैं.
(हाह ! अकेलापन छुपाने के लिए आदमी क्या नहीं करता
ye panktiyana to dimaag hila deti hain...
adbhut rachna ke liye badhai aapko
पिता एक चिराग की तरह होते है जो हमें रौशनी जरूर और जरूर देते है.
आस्मां की तरह जिनकी भले शाखाये ना हो पर जिन पर उड़ान भरी जा सकती है.
किसी छायादार दरख्त की तरह.
"लख अपराध करे बहु-भांति ,बहुड़ पिता गल लावे."(आप के तमाम अपराधों के बाद भी वो आप को गलें लगा लेते है क्षमा कर देते है
badhiyaa
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (16/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com
ब्रेकट जान लेवा है ....कई चीजों से भी ज्यादा .मसलन इससे
तुम पचास पार ढल रहे हो
और मैं पच्चीस में लबालब हूँ
या इससे
तुम बांह कसते गए और लोग छूटते गए
मानता हूँ, तुम्हारी उँगलियों में ग्रीस नहीं था
चिकनाई उनपर ही जमी थी
पर इससे नहीं......
सूचना क्रांति ने एहसास में कोई इजाफा नहीं किया है
keep it up.....one of the best read of today .....
हम कितने सुरक्षित थे अपने गोदाम में
पर तुमने मुझे वहां से निकाल कर
हाई वे पर चलने वाले ट्रक पर चढ़ा दिया
(जिन पर गुड्स कैरियर लिखा होता है)
हम थोक में तो पैदा नहीं हुए थे ना, मेरे बाप !!!
Bahut khoob ! ek naya andaaj samete rachnaa !
"सम्बन्धों की गरिमा इस विशुद्ध आदिम विचार को ढक लेती है।"-प्रवीण जी की पंक्तियां दोहराना चाहुंगा.
वैसे अापकी रचनाअों मे शिकायत का एक नया स्तर देखने को मिला.
तुम पचास पार ढल रहे हो
और मैं पच्चीस में लबालब हूँ
तुम्हें गिल्ट है नौकरी चले जाने का
मुझे धौंस तुम्हारी देखभाल का
और इस बात का सार दिया ब्रेकिट में ..बहुत बढ़िया प्रस्तुति
बहुत खुब प्रस्तुति.........मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ जिस पर हर गुरुवार को रचना प्रकाशित...आज की रचना "प्रभु तुमको तो आकर" साथ ही मेरी कविता हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" at www.hindisahityamanch.com पर प्रकाशित..........आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे..धन्यवाद
bahut acche hai..har ek tukde me jaise poora ka poora ehsaas udel dia ho..
कमेन्ट का अभिप्राय केवल उपस्थिति दर्ज कराना है...
रचना पर कुछ कहूँ,यह मनोवस्था नहीं...
बस ...लाजवाब !!!!
भई कुछ तो रहेम करो..कुछ तो बक्शो बाप जी को..और ईश्वर को भी..ऐसे ही पूरी इज्जत की पुरानी शेरवानी उतारने मे लगे हो..सो कुछ काम उनके बेटों पर भी छोड़ दो..:-)
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बेशक बहुत खूब लिखा है.
एक अलग तेवर /एक अलग अंदाज़..ग्रेट!
आज सुबह दुर्गेश की कहानी जहाज पढ़ी और अब तुम्हे पढ़ रहा हूँ सागर ... शायद इसलिए मैं सागर को पसंद करता हूँ .. गौड ब्लेस यू .
अर्श
kafi achchi lagi.
again awe struck.. ))
आम आदमी पर कुछ कवितायें लिखना चाहता था
भावुकता और महानता बघारने से बचते हुए...u r doing d same
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