पका हुआ प्रेम जैसे धुएं में सना भुट्टे का पुष्ट दाना

किसी पक्षी के रंगीन चोंच सा वितान लिए,
किसी खुद्दार की नाक, 
तमाम तरह की पर्वत श्रेणियों के बीच अचल, गंभीर पर्वत शिखर
धूप पड़ती बालुई धरती पर मरती घास के बीच से जाता अलसाया रस्ता जैसे 
मेड़ पर तकिया लगाए बारह हाथ का निडर, धामन सांप.


लॉन में अशोक का पेड़ जिसकी ऊंची जाती फुनगी,
यूकिलिप्टस के तने सी सादी कागज़ी जंघा, 
लंबी, ठंडी, पतली उंगलियों के बीच गोरी मरमरी कलाई। लकीरें ग़म में गीली
आँखों में कई पगडंडियां। एक रस्ता चरवाहा का, एक रस्ता कव्वाल का घर
होंठ यों आपस में लिपटे जैसे नाग-नागिन सहवास में रत
बनावट ऐसे काढ़े हुए कि मेरे नाम में ‘ग‘ के उच्चारण पर की स्टिल पिक्चर
एक हड्डी की नाजुक चोट से टूटकर बने गले और कंधे 
एक हरी लकड़ी टूटन के बाद भी अपने छाल से जुड़ी हुई
जिसके अंर्तवस्त्र हाथ में हो तो साँसें जंगली न हो प्राणायाम चले
भीड़ में होती हुई भीड़ से निकलती लगे.

प्रेम करता हुआ आदमी खोता जाता है मानवीय देह
उम्रदराज़ महिला से प्रेम करना जैसे 
छिलते पेंसिल से नोक का निकलना है 
स्लेटी रंग में सूख चुके आंसू सा चमकता उसका उदास नाम लिखना है
उम्रदराज़ महिला से प्रेम, समाधि में होना है।

6 टिप्पणियाँ:

Puja Upadhyay said...

खतरनाक लिखे हो! एकदम कमाल...यूँ तो पूरी कविता में अद्भुत बिम्ब हैं...कहीं से खुलते, कहीं से सिमटते...एकदम तीन बार फ़िदा!

और हाँ...हमारा दिल इस पर अटक गया है...'लकीरें ग़म में गीली'.

सागर साहब तक हमारा सलाम पहुंचे!

Vaishnavi Vaishnavi said...

saanse jangli na ho pranyaam ho jaye,prem ka aalokik roop,sundar ati sundar, i have no words ,its every words melting in our heart!

Sonal Rastogi said...

सागर लगता है जल्द ही तुम अपनी रचनाओं से मोक्ष को पा जाओगे ...और तुम्हारे नाम से अलग दीन चलेगा "दीन-ए -सागर "

प्रिया said...

baatein kab khatm hoti hai sagar saab ......Is abhage ka intro padh kar achcha laga.....haal mein badlen ho.....kavita hamko samajh nahi aai... thodi pecheeda hai...

रश्मि प्रभा... said...

aapki email id nahi mil rahi

Anonymous said...

बनावट ऐसे काढ़े हुए कि मेरे नाम में ‘ग‘ के उच्चारण पर की स्टिल पिक्चर
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इसे पढ़ते हुये जाने क्यों ये कहना याद आया कि मेरी तरह तुम्हारा नाम कोई नहीं लेता होगा। आज भी लगता है। इतने सालों बाद भी।