कवि कह गया है -2

इस वक्त
हां ठीक इसी वक्त

जब तुम अस्पताल के सफेद बिस्तर पर पड़ी हो
औ बाहर की वादियों में छाया है असंतोष
आत्मसम्मान की हड्डी को छील कर फेंका जा रहा है
सरों को गिलोटिन पर चढ़ाया जा रहा है
औ तुम अकेली अनशन के बीच जिए-मरी जा रही हो

इसी वक्त,
तुम्हें प्रकृति के खुशगवार नज़ारों के बीच जवान होते
पढ़ना था सुमित्रानन्दन पन्त की कविताएं
कि कैसे 'कला को देखकर बूढ़ा चाँद'
कहता है - मैं तुम्हें नग्न देखना चाहता हूं भावों से

सुना है
तुम्हारी चाहत गांधी और मण्डेला को पढ़ने की है
तुम्हें इसकी जरूरत नहीं 'शर्मिला'

इन किताबों की दरकार
सत्ता पर काबिज उन सामन्तों को है जो
नीरो बन बंसी बजा रहे हैं
उन युवाओं को जो
तनाव ग्रसित हो डिस्कोथेक में थिरक रहे हैं
उस अधेड़ आदमी को जो ब्लू फिल्में देख रहा है
उस सम्मानित कवि को जो सामाजिक सरोकार छोड़
काल्पनिक प्रेम कहानियों पर रूमानी ज़िल्द चढ़ाकर
पाठकों को भरमा रहा है

गर ये भी नहीं तो
तुम्हारी धीमी आवाज़ को बुलन्द करने का है

(इरोम शर्मिला को पढने के बाद विचलित होकर)
{चित्र : तहलका/चिठ्ठाचर्चा से}

22 टिप्पणियाँ:

dimple said...

ज़िन्दगी के नोट्स इकठ्ठे करने वाला किताबो को पढ़ के क्या करेगा.किताबे भी तो ज़िन्दगी का ही आईना है.रोम जल रहा है,नीरो बंसी बजा रहा है.पिकासो ज़िन्दगी भर नीले रंग में पेंटिंग्स बनाता रहा.कवी कहता रहा ज़िन्दगी चलती रही...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

कवि कह गया है भाग २ .....न जाने इसको पढ़ कर क्यों अमृता की पंक्तियाँ याद आ गयी ...
और इस से आगे
अनन्त खामोशी है
यह खामोशी जो टूटती नहीं
मेरे दोस्तों आओ
खामोशी की छाती में
हम कीलों की तरह गड़ जाएँ
आइनारेंड जैसे कीलों की तरह
और वक़्त आ गया है
की समुन्दर को फिर से मथ लें
और इस बार आदम को
या उसकी संभावना को खोज ले ...

डॉ .अनुराग said...

अभी कुछ नहीं कहूंगा ...चर्चा . में थोडा पहले कह चूका हूं...क्यूंकि जितना भी कहा जाये कम पड़ेगा

रंजना said...

Iske pathan manan upraant kuchh bhi kah paana sambhav hai kya ????

Nihshabd kar diya aapne.....

ओम आर्य said...

उस सम्मानित कवि जो सामाजिक सरोकार छोड़ काल्पनिक प्रेम कहानियों पर रूमानी ज़िल्द चढ़ाकर पाठकों को भरमा रहा है

मुझे इन पंक्तियों से कुछ सीखना चाहिए . है न ?

दिगम्बर नासवा said...

इस पुस्तक को पढ़ा तो नही है .... पर आपकी कविता देख कर लगता है .... कितनी सामाजिक विषमता का चित्रन होगा इस पुस्तक में .......... वैसे आपकी कलम भी उसी सामाजिक परिस्थिति का चित्रण करती है ... बहुत खूब लिखते हैं आप .........

दर्शन said...

gulal ka geet yaad aa raha hai.jis kavi kee kalpana me prem geet ho likha.us kavi ko aaj tum nkaar do.

rome jal raha tha,
neero bansuri baja raha tha,
our sare chuhe uske peeche ho liye

kahi padha tha yeats kee pankatia..
how can eye that girl standing there .my attetion fix on roman or on russian.or on spainish politics?

and may be what they say is true of war and wars alarms but o that i were young again and held her in my arms.

Manish Kumar said...

Jitni peeda vo sah rahi hain bas yahin sochta hoon ki kya unka ye samarpan kya un uddeshyon ki samay rahte praptai kar payega.

अपूर्व said...

जानते हो?..कभी कभी बड़ी पीड़ा और कोफ़्त होती है..कविता से और कथित कविताई से भी..
..कि क्या सच क्या फ़र्क पड़ता है हकीकत को इस सबसे.. कितनी नींदों मे खलल पड़ता है..कितने पत्थर मोम बन पाते हैं..कि क्या इस सबसे इरोम की व्यथा कहीं कम हो जायेगी?..या उसका उद्देश्य पूरा हो जायेगा..?
..देखो तो पिछले १० सालों मे ही कितना कुछ लिखा गया उस पर..और वह क्षरण के इस मुहाने पर पहुँचती रही...फिर खुद से पूँछता हूँ कि क्या हम यह सब इस लिये लिखते हैं कि हमें रात मे संतोषजनक नींद आ सके?..अपनी ड्यूटी पूरी कर देने की तृप्ति के स्वप्नो से भरी!..क्या उसे फ़र्क पड़ेगा इस सब से?.. हाँ हद से हद किसी लोर्का को मार कर जमीन मे दफ़्न कर दिया जायेगा..किसी पाश को गोली मार कर खामोश कर दिया जायेगा..या कोई मंटो किसी मेंटल हास्पिटल की फ़र्श पर ऐंड़ियाँ रगड़ते हुए रुखसत हो जायेगा...
...दमनकारी शक्तियाँ आप से तभी तक बेखबर रहती हैं..जब तक आप उनकी सत्ता के लिये खतरा नही बनते..उसके बाद वापस आने का कोई रस्ता नही होता..
मगर इस नींद का टूटना भी बेहद जरूरी होता है..शायद ऐसी कविताएं लाल चींटियों के झुंड की तरह होती है..जो अबोध, छुद्र और हानिरहित लगते हुए भी क्षमता रखती हैं..कि किसी सोये हुए इंसान को चिकोटी काट कर खोखले ख्वाबों से जगा सकें..
माफ़ करना दोस्त..क्या करूँ आपका ब्लॉग और आप दोनों अक्सर मुझे बेबाक और गुस्ताख होने की इजाजत दे देते हो..
जरूरी कविता के लिये शुक्रिया

sanjay vyas said...

ये आवाज़ उस भूगोल से आई है जो दशकों से अलगाववादी हिंसा में झुलस रहा है. बहुत आसान था इरोम के लिए इसी रास्ते की हिमायत करना,पर उसने इसके सिद्धांततः बिलकुल उलट रास्ता अपनाया.विरोध का ऐसा स्वर जिसे दिल्ली नहीं सुनती.आखिर वाचालों की नगरी एक और स्वर से भला क्यों परेशान होने लगी?
कवि ऐसे ही स्वर को आधार देता है,देना ही चाहिए.

वसंत में दाहकता का एक ज़रूरी रंग.

सागर said...

@ शुक्रिया अपूर्व जी,
यह कविता उद्वेलन, विचलन, असन्तुलन और विक्षोभ में लिखी गई थी। कई बातें और समेटनी थी पर...
गलतियां आगे भी होंगी इसकी गारंटी देता हूं...
आपके द्वारा बताए गए सभी गलतियों को सुधार लिया है और इसके लिए .... शुक्रिया से आभारी तक हूँ; सिवाय आखिरी के ..... क्यों न थोड़ा ज़ोर पाठकों को भी लगाने दिया जाए!

varsha said...

नौ भाई बहनों में सबसे छोटी मणिपुरी इरोम शर्मिला पर आपको पढना अच्छा लगा और यह भी की आप हमजुबां हुए .शुक्रिया.

अनूप शुक्ल said...

बड़ी आवेगपूर्ण अभिव्यक्ति है। सुन्दर बात है।

रवि कुमार, रावतभाटा said...

एक उम्दा रचना जो अपने सरोकारों को तलाशती है...

neera said...

विचलित और मजबूर करने वाली ..इरोम को समर्पित एक अच्छी और सच्ची कविता ...

Kishore Choudhary said...

सुंदर कविता.
कविता के सामाजिक सरोकार और जन आन्दोलनों के मुद्दों से उसका जुड़ाव स्वतः स्फूर्त हुआ करता है, प्रेम इसमें बाधक नहीं है.

गौतम राजरिशी said...

दो दिन पहले पहली बार पढ़ने के बाद चुपके से निकल गया था। कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई। ओम आर्य की तरह खुद को देखा दुबका हुआ इन्हीं पंक्तियों में...आज फिर आया। फिर से चुपके से निकल जाने की ख्वाहिश को चंद टिप्पणियों ने दमित किया।

...कवि/कविता जिस भावावेश या परिस्थितवश भी उपजता/उपजती हो, अपने आप में एक बड़ा आंदोलन होता/होती है। अब देखो ना कितने लोग होंगे जो शर्मिला के बारे में जानेत भी होंगे या उस विरोध से कोई सारोकार भी रखते होंगे? कितने? ऊँगलियों पे गिने जा सकने लायक?? ठीक? तुमने जाना, तुमने पढ़ा..एक कविता की उत्पत्ति हुई। एक बहुत ही सशक्त कविता की उत्पत्ति हुई। कवि खुश हुआ और हम जैसे कुछ मूढ़ किंतु खुद को पढ़ा-लिखा समझे जाने लायक पाठकों ने चंद शब्दों की बाजिगरी दिखा कर अपने विचार व्य्कत कर लिये हैं। किसी को अमृता याद आती है, किसी को दम तोड़ता मंटो...बस! और कुछ भी नहीं।

पता नहीं क्या कहना चाह रहा हूँ। हर बार होता है मेरे साथ ऐसा सच पूछो तो किसी अच्छी कविता को पढ़ लेने के बाद...बौखलाहट जैसा कुछ।

मेरे ख्याल से इस कविता को और तुम्हारी लिखी कुछ अन्य कवितायें भी इस श्रेणी में आती हैं...को और-और पाठकों ्तक न पहुंचने देना अन्याय होगा इसके तेवर के संग, इसमें से उठती आवाज के संग। दिल्ली में हो..तनिक सी और मेहनत करो कि ये प्रिंट मिडिया तक पहुंचे। महज ब्लौग तक ही सीमित न रहें।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यार इसके लिये बधाई नहीं आभार
तुमने मेरे काम को आगे बढ़ाया है
इसे अपनी पत्रिका मे छापूंगा…पक्का!

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

आपकी कवितायेँ पढ़ते-पढ़ते कम जानकार होने का दुःख सताता है !
क्या ये संवेदना इतने सन्दर्भों के बिना नहीं आ सकती !

अनूप शुक्ल said...

आज इसे फ़िर से पढ़ा और फ़िर अच्छा लगा।

pratibha said...

बहुत अच्छी कविता है सागर और अपूर्व की टिप्पणी भी.

Puja Upadhyay said...

इरोम शर्मीला के बारे में जब भी पढ़ती हूँ तुम्हारी ये कविता याद आती है...लगता है तुमने तो अपना कर्त्तव्य निभाया...हम क्या कर रहे हैं. आज तहलका पर उस खबर को फिर से पढ़ा...और फिर हिम्मत की है यहाँ कुछ लिखने की...
ये कविता पढ़ना इसलिए जरुरी है कि हम जान सकें...कि कैसे हम अपने कर्तव्यों का निबाह नहीं कर रहे....कि अगर हम लिख सकते हैं तो हमें लिखना चाहिए इस बात पर...मगर गहराते हुए दुःख को शब्द देना सबके बस की बात नहीं....कवि का ये कहना...पढ़ना जरुरी है...और हमारा शुक्रिया सागर कि तुमने इसे शब्द दिए.
अब भी मैं सोचती हूँ कि समाज में...बदलती परिस्थितियों में हमारी भूमिका क्या होनी चाहिए मैं इस कविता को देखती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि कभी मैं ऐसा कुछ लिख सकूंगी.