मैं चाहूंगा कि...


मैं चाहूंगा कि

थकते-हांफते शहर में
बची रहे तुतलाई आवाज़
बची रहे सिंदूरी शाम,
रेत पर पैरों के निशान,
किसी पत्थर पर इत्मीनान से रखे कंधे

बुजुर्गों के माथे पर अनुभव से उगी सुस्ताई झुर्रियां

बची रहे आवाजाही,
बची रहे धोखेबाजी

हक़ की लड़ाई, बागी तेवर
घोड़ों की सरपट टाप
कानफोड़ू शोर के बीच
अंर्तनाद।

बची रहे मौलिकता
बचा रहे साक्ष्य
विषय-क्रम जो
कालांतर में पीढ़ियों के
पाठ्यक्रम में शामिल रहे

बची रहे
सैनिक की सेहत,
खिलाड़ी की अदम्य जिजीविषा,
रोटी की खुशबू,
पसीने की महक,
शराबी का प्यार,
कामी की वासना,
पापी का उपेक्षित कर्म,
कवि का कविता-कर्म
औ'
औरत के जज्बात का मर्म

मदमाती लौ,
बचे रहें भटकते कदम

मैं चाहूंगा कि...
बचा रहे हमारा प्रेम

इसके लिए तुम बचाना
मेरे अस्तित्व का अध्याय

जैसे मैंने बचाए हैं
अपमानित होने की दशा में
मुंह चुराती शर्मिंदगी

जैसे
अभाव में बच जाते हैं सपने
जैसे
मौके गंवाने के बाद
बच जाता है पछतावा

... बचाए रखना हमारा प्रेम

उम्र के किसी मोड़ तक
शायद; अगले मिलन तक
बची रहना तुम भी,
बचाए रखना आंखों के डोरे में तैरता रक्त प्रवाह

मैं चाहूंगा कि
कल जब इतिहास खंगाले
सभ्यता
तो;
छन कर बच जाए

...प्रेम...

33 टिप्पणियाँ:

रंजू भाटिया said...

मैं चाहूंगा कि
कल जब इतिहास खंगाले
सभ्यता
तो;
छन कर बच जाए

...प्रेम...

अमीन !! यही सबसे मुश्किल है बचाना आज कल के वक़्त में ..बहुत पसंद आई आपके लिखे यह लफ्ज़ शुक्रिया

ओम आर्य said...

मैं चाहूंगा कि
कल जब इतिहास खंगाले
सभ्यता
तो;
छन कर बच जाए

...सागर...

दिगंबर नासवा said...

आमीन .......... आज आप की कविता में एक जद्दो जहद, एक कशमकश नज़र आ रही है ..... अस्तित्व को, प्रेम को, भविष्य को बचाए रखने की चाह दिख रही है ......... बहुत लाजवाब है हमेशा की तरह कुछ अलग हट कर .......

Satya Vyas said...

evam astu .
aisa hi hoga . vishwash rakhen saagar.
aap jaise purodha hai abhi isko bachane ke liye.
haan bus ek typing error kalantar ko kaalantar kar le. kyunki thoda arth change ho raha hai mujh na samajh ki samajh se.

satya

अनिल कान्त said...

अमाँ मियाँ इतना कातिलाना लिखते हो कि तुम्हारे एक एक शब्द को पुनः पढ़ने का मन करता है .

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

खूबसूरत kavita......

के सी said...

कविता सभ्यता की पहचान करती हुई, उसे दर्ज करती है. सब जरूरत की चीजों को टटोलती है उनके होने के महत्त्व को भी रेखांकित करती है. सागर सच है कि कुछ ऐसी चीजें भी बची रहनी चाहिए जो भले ही श्रेष्ठ न हों पर हमारे समाज को परिभाषित करती हों. कविता एक प्रार्थना की तरह भी लगती है मुझे, जैसेकि ये प्रेम के अक्षुण रहने के शब्द दोहराती है. सुंदर.

Sadhana Vaid said...

apne badi khoobsurati se har woh cheez apanee chahat me shumar kar lee hai jo ek sundar jeevan ke liye zaroori hai. bahut khoobsoorat rachanaa hai . badhai .

अपूर्व said...

आया तो था आपकी पिछली कविता को अर्घ्य देने मगर देखा कि नया बिरवा लहलहा रहा है..
हर नयी कविता के साथ चमत्कृत करते जा रहे हो आप..अभी कितने और मणिवान सांप छिपा रखे हैं इस पिटारी मे..उत्सुकता होती है..
खैर यह कविता तो फ़ुरसत मे पढी जाने वाली है..बहुत फ़ुरसत मे..जो ४०-५० साल बाद मिलनी चाहिये..अगर वक्त ने इजाजत दी तो...और आपने भी ४०-५० साल पहले ही लिख डाली है..गलत बात है ;-)
फ़िलहाल दो पंक्तियां ले जा रहा हूँ चबाने के लिये..
पहली अहोभाव के साथ..
जैसे अभाव में बच जाते हैं सपने

और दूसरी शंका के साथ..
पापी का उपेक्षित कर्म
..का मतलब समझने की कोशिश में...

neera said...

वाह!

मैं चाहूंगा कि
कल जब इतिहास खंगाले
सभ्यता
तो;
छन कर बच जाए


...प्रेम...

कंचन सिंह चौहान said...

जैसे
अभाव में बच जाते हैं सपने
जैसे
मौके गंवाने के बाद
बच जाता है पछतावा


... बचाए रखना हमारा प्रेम


और

मैं चाहूंगा किकल जब इतिहास खंगाले सभ्यतातो;छन कर बच जाए
...प्रेम...


मन को छूने वाली है ये पंक्तियाँ

डिम्पल मल्होत्रा said...

मैं चाहूंगा कि..
copy paste ke zmane me bhi bachi rahe moulikta.
tmaan shor ke beech me me bhi gunjta rahe anhad naad.
mout ko yaad rakhte hue bhi jeene ki ichha bachi rahe.
itihas or bhwish bacha rahe.
kavita kavi or prem!

Puja Upadhyay said...

दरख़्त को काट कर, छील कर जब किसी के पढने के लिए टेबल बनायीं जाए...मैं चाहूंगी की उसपर वो नाम खुदे रह जाएँ जो किसी प्रेमी ने लिखे थे अपने प्रेम को अमर करने के लिए...क्लास की किसी डेस्क की तरह दीखते तुम्हारे ब्लॉग पर रहे वो सारी खुरचनें जो एक बोरिंग क्लास सुनते हुए तुमने लिखी थीं...चाहूंगी की तुम्हारे ब्लॉग पर ही समेट कर रख सको पटना की कुछ शामें और गंगा का बरसात में लाल मटिया सा हो जाना...

एक अच्छी कविता...ऐसी कुछ कवितायेँ बची रहे तो प्रेम भी अपनेआप को खोकर भी ढूंढ पाने की उम्मीद पाल सकेगा.

गौतम राजऋषि said...

मंगलेश डबराल जी की वो कविता याद आ गयी...वो "कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा" वाली।

सागर said...

वजह फ़रमाया आपने गौतम जी,

'कवियों में बची रहे थोड़ी सी लज्जा' नामक यह कविता मेरी पसदीदा ब्लॉग 'अनुनाद' पर उपलब्ध है... सुधी पाठक वहां से पढ़ सकते हैं.. लिंक मैं दे रहा हूँ

http://anunaad.blogspot.com/

हाँ, मेरे ब्लॉग पर इसकी दूसरी किस्त मान लीजिये... जो की उस वाले के आस पास भी नहीं ठहरती... पर क्या करें... है तो आखिर सागर बीड़ी मार्का वाली कविता... धूकिये जी भर कर...

डॉ .अनुराग said...

तुम तक आता हूं तो ठिठका रह जाता हूं ....ओर
"बचाए रखना"
इस शब्द ने मुझे जैसे गुलाल के एक गाने की याद दिलाई है ...कभी कभी लगता है कुछ खुरदुरा सा है कही..इसे रेग्मार्क से थोडा घिस दूं...फिर दोबारा देखता हूं तो लगता है अरे ...यही तो शायद इस कविता की आत्मा है ....

TRIPURARI said...

आपकी इस कोशिश में हम भी शामिल हैं!

Amrendra Nath Tripathi said...

हुजूर !
आपने लिखा '' आखिर सागर बीड़ी मार्का वाली कविता '' , ये क्या ?
कहीं ऐसा तो नहीं यह किसी ' परम अभिव्यक्ति ' की खीझ हो !
खैर अधिकांश किसान जनता इस बीड़ी को ही अंगीकार करती है ,
.
.
कविता पर कुछ कहना किसी के 'व्यक्तिनिष्ठ' में हस्तक्षेप - सा है , फिर
भी ....
'' बची रहे
सैनिक की सेहत,
खिलाड़ी की अदम्य जिजीविषा,
रोटी की खुशबू,
पसीने की महक,
शराबी का प्यार,
कामी की वासना,
पापी का उपेक्षित कर्म,
कवि का कविता-कर्म
औ'
औरत के जज्बात का मर्म

मदमाती लौ,
बचे रहें भटकते कदम ''
----------- यहाँ ' पापी का उपेक्षित कर्म ',
' शराबी का प्यार ' कविता की रौ में
मुझे खटकते से लगे , फिर सोचता हूँ कहीं
मैं वस्तुनिष्ठता का शिकार तो नहीं हो रहा हूँ ..
...... कविता दमदार है , मुझे बद्रीनारायण की
कविता ''प्रेम पत्र '' की याद आने लगी ...
............. आभार ,,,

कुश said...

जमीन पर गिरा हुआ हूँ.. कोई आकर उठा ले..

sanjay vyas said...

समय के बड़े विस्तार को देखती कविता.असल काव्यानंद के साथ.
और विकास क्रम की आशंका में एक याचना और-
स्तन पाइयों में बचा रहे थोडा मेरु-दंड.

गौतम राजऋषि said...

कविता की सुगंध लेने और नयी टिप्पणियों का जायका लेने आया था फिर से....संजय व्यास जी ने नया आयाम दे दिया तुम्हारी अद्‍भुत पंक्तियों को।

अर्कजेश said...

आमीन !

संध्या आर्य said...

आपके भाव और जिस अन्दाज मे लिखते है उसके हम कायल है ......अगर यह बीडी छाप है तो मै यह दुआ करती हूँ कि सभी लोगों के भाव बीडी छाप हो जाये ताकि इंसानियत को और कुछ सालो तक बचाया जा सके ..........आप और् ज्यादा बीडी छाप हो जाओ तकि ऐसे ही लिखते रहो और हम पाठक इसे आपके कथनानूसार धूकते जाये!

दर्पण साह said...

कानफोड़ू शोर के बीच
अंर्तनाद।
कहीं आप सम्भोग से समाधी तो नहीं पढ़ चुके या, mtv और 'आस्था' चैनल २२-२३ पे ही सेव हैं?
मैं भी चाहता हूँ की आदमी का आदमीपन बचा रहे नहीं तो कम से कम प्रेम. वैसे अगर सबसे अंत में ख़त्म होगा तो प्रेम, या यूँ कहूं की प्रेम के ख़त्म होने पर सब कुछ ख़त्म. तो इस तर्क के हिसाब से हमारे होने तक रहेगा प्रेम.

देख रहा हूँ की 'गीता' और 'गुनाहगार' मेरी किताबों की शेल्फ मैं इक साथ रखी हैं.

हरकीरत ' हीर' said...

जैसे मैंने बचाए हैं
अपमानित होने की दशा में
मुंह चुराती शर्मिंदगी


दिलचस्प .....!!

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) said...

@मैं चाहूंगा कि
कल जब इतिहास खंगाले
सभ्यता
तो;
छन कर बच जाए

...प्रेम...


गहन आशावाद.. सुना था सागर मंथन से विष निकला था.. यहाँ देखकर तो ऐसा कुछ नहीं लगता..

अपूर्व said...

बचे रहें भटकते कदम

भई यह ’भटकना’ भी एक रहस्यमय क्रिया है..अक्सर अकर्मक सी..
वक्त के जरा से धक्के से कदम भटक जाते हैं..कदम सलामत रहें तो राहें भटक जाती हैं..
..और राहों को समझा-बुझा कर राह पे लाये..तो फिर मंजिल ही भटक जाती है..और नतीजा वही !!

जुस्तजू-ए-मंजिल मे एक जरा जो दम लेने
काफ़िले ठहरते हैं, रस्ता भूल जाते हैं.

..खैर दोबारा पढ़ने आया था आपको और अटक गया कहीं..

Dr. Shreesh K. Pathak said...

नए साल मे यह शुभाशा....!

सुस्ताई झुर्रियां

इसके लिए तुम बचाना
मेरे अस्तित्व का अध्याय

जैसे मैंने बचाए हैं
अपमानित होने की दशा में
मुंह चुराती शर्मिंदगी


आज कवि ममतामयी बन गया है...! सब कुछ बचा लेना चाहता है. क्या बद क्या बेहतर..सबकी जरूरत है उसको..कौन जाने सभ्यता किसकी खोज करने लगे प्राची के उस पार...!

सागर भाई..! बेहतर लगी आपकी कविता..कुछ सागर धीर-गंभीर हो रहा है..शायद..गहराई तो सागर मे हमेशा ही होती है..पर चंचलता कुछ कम हुई है यहाँ....हम तो उसके भी दीवाने है..मचलते हैं..उसके भी खातिर..!

ऐ सागर..! कुछ हिलोरों पर बस तेरा ही हक है....लहरें तेरा ही गीत गाती रहती हैं..!

खटकता है मुझे जो अपनी टिप्पणी आपके पोस्ट के नीचे नही दिखायी देती..!

दर्पण साह said...

वो गाना याद है...
'हम न रहेंगे , तुम न रहोगे...'
या फ़िर वो वाला...
'प्यार तो, हमेशा रहेगा'
पूरी नज़्म को पढने के बाद मन कर रहा कहूं,
आमीन.
और फिर न जाने क्यूँ उस दिन राजू श्रीवास्तव वाला प्लास्टिक प्यार याद हो आता है...
'हेल्लो ! हाय !! आय हाय !!!'

मुझे तो प्रेम रहे न रहे इस डर से भी ज़्यादा डर इसकी परिभाषा के बदलने से लगता है.
और मैं चाहता हूँ,
प्रेम भी बदले न....
वो रहे तो वैसे ही रहे जैसे किसी उद्धव को उल्हाने देते वक्त गोपियों का था,

कानफोड़ू शोर के बीच अंर्तनाद।
क्या आस्था चैनेल और MTV दोनों २२-२३ में सेव हैं आपके TV में.

देख रहा हूँ 'गीता', और 'गुनाहों का देवता अगल बगल ही राखी हैं 'मेरे शेल्फ में.
और देख रहा हूँ सपना कि मैं अंगुलिमाल बन गया हूँ.
और आप कालिदास....

दर्पण साह said...

दोबारा कमेन्ट किया है वो भी लगभग समान बस ऐसे ही...

शिरीष कुमार मौर्य said...

कविता अच्छी है. सागर अभी लहरा रहा है ! विचारभूमि पर थोड़ा ठहरेगा, थिर और शांत बनेगा तो अपनी असल गहराइयों का पता देगा. गौतम और संजय भाई ने सार्थक हस्तक्षेप किया - मैं भी चाहूँगा कि स्तनपाइयों में बची रहे रीढ़. सागर आपको शुभकामनाएं.

दर्शन said...

मैं चाहूंगा कि
कल जब इतिहास खंगाले
सभ्यता
तो;
छन कर बच जाए

...प्रेम...

Laga jaisey dil k gahrey samnder se moti chura liya ho ...

ye line to bhawuk kar gayi haume
awesome

amar said...

मैं चाहूंगा कि
कल जब इतिहास खंगाले
सभ्यता
तो;
छन कर बच जाए

...प्रेम...
ultimate .. main fan ho gaya aap ki writing ka